मशहूर ऐतिहासिक रौजा सदर उर्स मेला कल
*आस्था, उल्लास और तरबूज वाले इस मेले की है अलग पहचान*
*हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक मेला,*
बबलू प्रजापति
पिहानी के ऐतिहासिक स्थल रौजा सदर, जो अपनी पुरख़ेनी तारीख और आध्यात्मिक अहमियत के लिए जाना जाता है, इस रविवर उर्स का भव्य आयोजन करेगा। इसे तरबूज वाला मेला भी कहते हैं, जहां दूर-दराज से लोग दरगाह पर आते हैं और सदर जहां व बदल जहां पर चादरपोशी करते हैं। उर्स के इस मौके पर अकीदतमंद अपनी दुआओं और मन्नतों के साथ दरगाह की रौनक बढ़ाते हैं। शाम को चिराग जलाए जाते हैं, और हर तरफ रोशनी और भक्ति का माहौल होता है। मेले में स्वादिष्ट चाट, पकौड़ी, तरह-तरह के झूले और दुकानों का मज़हब भरपूर संगम देखने को मिलता है। यह केवल एक धार्मिक दरगाह नहीं, बल्कि मुगलकालीन इतिहास, सूफी संस्कृति, स्थापत्य कला और गंगा-जमुनी तहज़ीब की जीवित मिसाल माना जाता है।
इतिहासकारों के अनुसार, “सदर जहाँ” मुगल बादशाह हुमायूं के शासनकाल से जुड़े एक उच्च पदाधिकारी या सूबेदार बताए जाते हैं। माना जाता है कि जब शेरशाह सूरी और हुमायूं के बीच संघर्ष चल रहा था, उस समय हुमायूं ने अवध क्षेत्र के कई स्थानों में शरण ली थी। उसी दौर में पिहानी का क्षेत्र घने जंगलों और छोटी बस्तियों से घिरा था। कहा जाता है कि बाद में सदर जहाँ को यह इलाका जागीर के रूप में मिला और उन्होंने यहां प्रशासनिक तथा धार्मिक केंद्र स्थापित कराया।
स्थानीय जनश्रुतियों के मुताबिक, सदर जहाँ ने यहां एक विशाल रौजा, मस्जिद और खानकाह का निर्माण कराया। उस समय यह स्थान इस्लामी शिक्षा, सूफी परंपरा और सामाजिक मेलजोल का प्रमुख केंद्र बन गया था। दूर-दराज से फकीर, आलिम और अकीदतमंद यहां आते थे। धीरे-धीरे इस स्थल के आसपास आबादी बढ़ी और पिहानी कस्बे का विस्तार हुआ।
रौजा परिसर में बनी प्राचीन इमारतों में मुगलकालीन स्थापत्य कला की झलक आज भी दिखाई देती है। मेहराबदार दरवाजे, ऊंची दीवारें, पुरानी ईंटों की बनावट और गुंबद उस दौर की वास्तुकला को दर्शाते हैं। कई इतिहास प्रेमी इसे हरदोई जनपद की महत्वपूर्ण धरोहर मानते हैं।
यह भी कहा जाता है कि यहां स्थित “मस्जिद-ए-दमिश्क” का निर्माण मध्य एशियाई शैली से प्रेरित था। पुराने समय में यहां कुरान की तालीम, सूफी महफिलें और सामाजिक पंचायतें भी आयोजित होती थीं।
May 25 2026, 15:38
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