सरस्वती-सिंधु सभ्यता ने ज्ञान और तकनीकी विकास की प्राचीन परंपरा को दिखाया
- पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम के छठवें दिन भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों पर विशेषज्ञ ने दिया व्याख्यान
लखनऊ। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय की ओर से आयोजित ‘पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम-2026’ के छठवें दिन मंगलवार को सरस्वती-सिंधु सभ्यता और प्रारंभिक भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न पहलुओं पर विशेषज्ञ व्याख्यान हुआ। केंद्रीय विश्वविद्यालय, हरियाणा के इतिहास एवं पुरातत्व विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर तथा चंडीगढ़ के संग्रहालय एवं पुरातत्व विभाग के उपनिदेशक डॉ. नरेंद्र परमार ने ‘सरस्वती-सिंधु सभ्यता: भारतीय ज्ञान परंपरा के नए आयाम’ और ‘प्रारंभिक भारतीय ज्ञान परंपरा’ विषयों पर प्रतिभागियों से संवाद किया।
व्याख्यान के दौरान डॉ. परमार ने पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर प्राचीन भारत में ज्ञान परंपरा के विकास को समझाया। उन्होंने बताया कि उस दौर में विकसित ज्ञान केवल सैद्धांतिक नहीं था, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण, कृषि, उत्पादन, तकनीक और सामाजिक जीवन से जुड़े व्यावहारिक अनुभवों पर भी आधारित था।
- नगर नियोजन से जल प्रबंधन तक पर चर्चा
डॉ. परमार ने सरस्वती-सिंधु सभ्यता से जुड़े पुरातात्त्विक प्रमाणों के माध्यम से नगर नियोजन, वास्तुकला, जल प्रबंधन, जल निकासी, मापन-पद्धति, कृषि, शिल्प, धातुकर्म और व्यापार जैसे विषयों पर विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने धोलावीरा की जल-संग्रह और जल प्रबंधन व्यवस्था का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां की सुव्यवस्थित नगरीय संरचना, जल निकासी प्रणाली और मानकीकृत बाट-माप तत्कालीन समाज की तकनीकी दक्षता और पर्यावरण के अनुरूप जीवन जीने की क्षमता को दर्शाते हैं।
- प्रायोगिक प्रदर्शन से समझीं प्राचीन तकनीकें
व्याख्यान की खास बात विषय से जुड़े पुरातात्त्विक साक्ष्यों और ज्ञान प्रणालियों का प्रायोगिक प्रदर्शन रहा। इसके जरिए प्रतिभागियों को प्राचीन ज्ञान, तकनीकी कौशल और पुरातात्त्विक प्रमाणों के बीच संबंधों को व्यावहारिक तरीके से समझने का अवसर मिला। प्रदर्शन ने कार्यक्रम को संवादात्मक और अधिक रोचक बनाया।
- 150 से अधिक प्रतिभागियों ने लिया हिस्सा
पुरातत्व निदेशालय की निदेशक रेनू द्विवेदी ने मुख्य वक्ता डॉ. नरेंद्र परमार का पौधा और स्मृति-चिह्न देकर स्वागत किया। उन्होंने कहा कि सरस्वती-सिंधु सभ्यता और प्रारंभिक भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन देश के वैज्ञानिक, तकनीकी और पर्यावरणीय विकास के ऐतिहासिक पक्षों को समझने में महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि विशेषज्ञ के शोधपरक व्याख्यान और प्रायोगिक प्रदर्शन से प्रतिभागियों को भारतीय ज्ञान परंपरा और पुरातात्त्विक विरासत को समग्र दृष्टि से समझने का अवसर मिला। कार्यक्रम में 100 से अधिक प्रतिभागियों ने ऑफलाइन और 50 से अधिक ने ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता की।
कार्यक्रम के अंत में श्री राम विनय ने मुख्य वक्ता, निदेशक, अतिथियों, प्रतिभागियों और आयोजन में सहयोग करने वाले सभी लोगों के प्रति आभार जताया। मंच संचालन डॉ. मनोज कुमार यादव ने किया।
5 hours ago
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