बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की नई विदेश नीति
-अमरेश द्विवेदी-
आज की वैश्विक राजनीति में किसी एक बड़े देश के साथ मजबूत संबंध होना पर्याप्त नहीं रह गया है। व्यापार युद्ध, टैरिफ, रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, चीन की बढ़ती ताकत और ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता ने दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को अपनी विदेश नीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। भारत भी इस बदलाव से अछूता नहीं है।
गत दिनाें न्यूयॉर्क टाइम्स ने प्रधानमंत्री मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच तुलना करते हुए एक लेख छापा है। जिसमें बताया गया है कि प्रधानमंत्री मोदी जब-जब विदेश यात्रा पर जाते हैं तो उनका किस तरह से सम्मान होता है और उस देश का सर्वोच्च सम्मान दिया जाता है। दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप हैं जो नोबेल पुरस्कार पाने के लिए क्या कुछ कर रहे हैं लेकिन फिर भी नहीं मिल पा रहा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति में पिछले कुछ समय में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है। भारत अब केवल अमेरिका या किसी एक बड़े शक्ति-केंद्र पर निर्भर रहने के बजाय यूरोप, रूस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा, नॉर्वे और अन्य देशों के साथ समानांतर रूप से आर्थिक एवं रणनीतिक संबंध मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
पिछले एक वर्ष में प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं की गति इस बदलाव को स्पष्ट रूप से दिखाती है। अलग-अलग देशों के साथ बैठकें केवल पारंपरिक कूटनीतिक मुलाकातें नहीं रह गई हैं बल्कि उनमें व्यापार, निवेश, रक्षा तकनीक, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, शिक्षा और रोजगार जैसे ठोस मुद्दों पर समझौते किए जा रहे हैं। इस रणनीति के पीछे सबसे बड़ा कारण वैश्विक अनिश्चितता है।
अमेरिका की व्यापार नीति में बदलाव, भारत पर लगाए गए भारी भरकम टैरिफ और रूसी तेल खरीदने को लेकर पैदा हुआ विवाद नई दिल्ली के लिए एक चेतावनी की तरह सामने आया। जिस अमेरिका को भारत लंबे समय से एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मानता रहा है, उसी के साथ व्यापारिक तनाव ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या भारत को अपनी आर्थिक निर्भरता को और अधिक विविध बनाना चाहिए? उत्तर काफी हद तक ‘हां’ में दिखाई देता है।अमेरिका भारत का सबसे बड़ा एकल निर्यात बाजार रहा है। ऐसे में अमेरिकी बाजार में किसी भी बड़े व्यापारिक व्यवधान का भारतीय उद्योग, निर्यातकों और रोजगार पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए यूरोप, ब्रिटेन, एशिया और अन्य क्षेत्रों में नए बाजार तलाशना भारत के लिए केवल कूटनीतिक विकल्प नहीं बल्कि आर्थिक आवश्यकता भी बन गया है।
प्रधानमंत्री मोदी की हालिया विदेश नीति को एक तरह की डील-मेकिंग डिप्लोमेसी कहा जा सकता है। विदेश यात्राओं में अब केवल साझा बयान या राजनीतिक दोस्ती महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि ठोस लक्ष्य निर्धारित किए जा रहे हैं। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत केवल विदेशी निवेश आकर्षित करने की कोशिश नहीं कर रहा, बल्कि तकनीक, उत्पादन क्षमता और वैश्विक बाजार तक पहुंच भी चाहता है। जर्मनी से पनडुब्बी तकनीक, फ्रांस के साथ एआई और गवर्नेंस, दक्षिण कोरिया के साथ जहाज निर्माण और निवेश तथा यूरोप के साथ मुक्त व्यापार समझौते जैसे प्रयास इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं।
- यूरोप : भारत के लिए नया आर्थिक स्तंभ
भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौता इस रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा सकता है। लगभग दो दशकों से चल रही व्यापार वार्ता बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच आगे बढ़ी। भारत ने यूरोपीय उत्पादों के लिए कुछ टैरिफ कम करने पर सहमति जताई, जबकि बदले में भारतीय कंपनियों के लिए यूरोपीय बाजार में बेहतर पहुंच की संभावना बनी। यूरोप भारत के लिए सिर्फ एक बड़ा बाजार नहीं है। वह तकनीक, पूंजी, उच्च गुणवत्ता वाले विनिर्माण, हरित तकनीक और रक्षा सहयोग का भी महत्वपूर्ण स्रोत है। फ्रांस के साथ भारत की बढ़ती नजदीकी इसका उदाहरण है। दोनों देशों के बीच रक्षा संबंध पहले से मजबूत हैं लेकिन अब एआई, डिजिटल तकनीक और व्यापार जैसे क्षेत्रों में भी साझेदारी बढ़ रही है। भारत के लिए यूरोप के साथ संबंधों का महत्व इसलिए भी बढ़ रहा है क्योंकि इससे अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कुछ हद तक कम की जा सकती है।
यूरोप के साथ बेहतर व्यापारिक संबंध भारतीय निर्यातकों के लिए नए बाजार खोल सकते हैं। इससे ऑटोमोबाइल, फार्मास्युटिकल्स, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और आईटी जैसे क्षेत्रों को लाभ मिल सकता है। इसके अलावा यूरोपीय कंपनियां भारत में निवेश करती हैं तो इससे पूंजी और तकनीक के साथ रोजगार भी बढ़ सकता है। लेकिन मुक्त व्यापार समझौते का दूसरा पहलू भी है। विदेशी उत्पादों के लिए भारतीय बाजार अधिक खुलने से घरेलू कंपनियों पर प्रतिस्पर्धा का दबाव बढ़ेगा। विशेष रूप से छोटी और मध्यम भारतीय कंपनियां यदि उत्पादकता और तकनीक में पीछे हैं तो उनके लिए यूरोपीय कंपनियों से मुकाबला करना कठिन हो सकता है। इसलिए केवल बाजार खोलना पर्याप्त नहीं है। भारत को अपने घरेलू उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी बढ़ानी होगी।
- अमेरिका से दूरी नहीं, बल्कि जोखिम का प्रबंधन
भारत की नई रणनीति को अमेरिका से दूरी बनाने के रूप में देखना सही नहीं होगा। वास्तविकता यह है कि भारत और अमेरिका के संबंध रक्षा, तकनीक, शिक्षा, निवेश और इंडो-पैसिफिक रणनीति के कारण बेहद महत्वपूर्ण हैं। दोनों देश चीन की बढ़ती ताकत को लेकर भी कई समान चिंताएं रखते हैं। लेकिन व्यापार और रूस के मुद्दे पर मतभेदों ने भारत को यह एहसास कराया है कि किसी भी एक साझेदार पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम पैदा कर सकती है। यही कारण है कि भारत एक ओर अमेरिका के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है तो दूसरी ओर जापान, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और अन्य देशों के साथ अपने विकल्प मजबूत कर रहा है। यह रणनीति ‘बैलेंसिंग’ से अधिक ‘विविधता’ की रणनीति दिखाई देती है। भारत का संदेश साफ है कि किसी एक देश के साथ संबंध खराब होने की स्थिति में भी उसकी अर्थव्यवस्था और रणनीतिक हित पूरी तरह प्रभावित न हों।
- रूस के साथ संबंध: पुरानी दोस्ती की नई परीक्षा
रूस भारत की विदेश नीति का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है। रक्षा क्षेत्र में दोनों देशों के दशकों पुराने संबंध हैं। ऊर्जा के क्षेत्र में भी रूस भारत के लिए महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है। लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद भारत के सामने कठिन कूटनीतिक संतुलन पैदा हुआ। पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करते हुए भारत रूस से भी रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए रखना चाहता है। शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों पर रूस के साथ संवाद जारी रखना इसी रणनीति का हिस्सा है। रूस के साथ संबंध भारत को ऊर्जा और रक्षा के क्षेत्र में वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध कराते हैं। इससे भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता बढ़ती है। लेकिन रूस पर अत्यधिक निर्भरता भी जोखिम पैदा कर सकती है। युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस की अर्थव्यवस्था तथा वैश्विक व्यापारिक भूमिका बदल रही है। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी रक्षा आपूर्ति और ऊर्जा सुरक्षा किसी एक स्रोत पर निर्भर न हो।
- ऊर्जा सुरक्षा : भारत की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के बड़े हिस्से के लिए कच्चे तेल का आयात करता है। इसलिए पश्चिम एशिया में किसी भी बड़े संकट का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य इसका सटीक उदाहरण है। यदि इस मार्ग में लंबे समय तक व्यवधान पैदा होता है तो तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं और भारत के आयात पर दबाव पड़ सकता है। इसका असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं होगा। महंगा तेल परिवहन लागत बढ़ाएगा, जिससे खाद्य पदार्थों और औद्योगिक वस्तुओं की कीमतें भी प्रभावित हो सकती हैं। इसीलिए भारत को ऊर्जा स्रोतों और परिवहन मार्गों दोनों में विविधता लानी होगी। सऊदी अरब, यूएई, रूस, अमेरिका और अन्य उत्पादकों के साथ संबंध बनाए रखना तथा वैकल्पिक ऊर्जा और परिवहन बुनियादी ढांचे पर निवेश करना लंबे समय में भारत के लिए जरूरी है।
महत्वपूर्ण खनिज और मैन्युफैक्चरिंग
भारत की अगली बड़ी चुनौती मैन्युफैक्चरिंग है। मोबाइल फोन, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण और नवीकरणीय ऊर्जा जैसी तकनीकों के लिए लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और अन्य महत्वपूर्ण खनिज जरूरी हैं। यदि भारत इन खनिजों के लिए सीमित देशों पर निर्भर रहता है तो भविष्य में सप्लाई चेन संकट उसकी औद्योगिक महत्वाकांक्षाओं को प्रभावित कर सकता है। इसलिए भारत का अलग-अलग देशों के साथ खनिज और औद्योगिक साझेदारी विकसित करना आर्थिक सुरक्षा का हिस्सा है। यहां विदेश नीति सीधे ‘मेक इन इंडिया’ और रोजगार से जुड़ जाती है। यदि विदेशी तकनीक भारत में आती है, लेकिन उत्पादन विदेश में ही होता रहता है, तो भारत को सीमित लाभ मिलेगा। असली फायदा तब होगा जब तकनीक के साथ भारत में उत्पादन, अनुसंधान और रोजगार भी पैदा हों।
भारत की इस बहु-दिशात्मक विदेश नीति के कई स्पष्ट फायदे हैं। पहला फायदा जोखिम में कमी। यदि एक बाजार में समस्या आती है तो दूसरे बाजार भारतीय निर्यात को सहारा दे सकते हैं। दूसरा तकनीक का हस्तांतरण। रक्षा, एआई, जहाज निर्माण और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में विदेशी तकनीक भारत की औद्योगिक क्षमता बढ़ा सकती है। तीसरा निवेश, अलग-अलग देशों के साथ आर्थिक समझौते विदेशी निवेश आकर्षित करने में मदद कर सकते हैं। चौथा—रोजगार, मैन्युफैक्चरिंग और नए औद्योगिक कॉरिडोर रोजगार के अवसर पैदा कर सकते हैं। पांचवां रणनीतिक स्वायत्तता, भारत किसी एक शक्ति के दबाव में आने से बच सकता है। छठा वैश्विक प्रभाव, जब दुनिया के कई महत्वपूर्ण देश भारत के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंध मजबूत करना चाहते हैं, तो भारत की वैश्विक सौदेबाजी की शक्ति बढ़ती है।
इस रणनीति की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि बहुत अधिक साझेदारियों को एक साथ संभालना आसान नहीं है। भारत को अमेरिका के साथ संबंध भी मजबूत रखने हैं, रूस से रक्षा और ऊर्जा सहयोग भी जारी रखना है, यूरोप के साथ व्यापार बढ़ाना है और चीन के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए जापान तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ सहयोग भी करना है। इन सभी हितों के बीच संतुलन बनाना कठिन है। दूसरी चुनौती है समझौतों को लागू करना। किसी समझौते पर हस्ताक्षर करना आसान है लेकिन उससे वास्तविक निवेश, रोजगार और तकनीक भारत में लाना कठिन प्रक्रिया है। नौकरशाही, भूमि, लॉजिस्टिक्स, टैक्स व्यवस्था, कुशल श्रम और बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्याएं निवेश की गति को प्रभावित कर सकती हैं। तीसरी चुनौती घरेलू उद्योग की है। व्यापार समझौतों से बाजार खुलेंगे लेकिन भारतीय कंपनियों को भी वैश्विक स्तर की गुणवत्ता और उत्पादकता हासिल करनी होगी। चौथी चुनौती यह है कि विदेश नीति की सफलता को केवल विदेश यात्राओं और समझौतों की संख्या से नहीं मापा जा सकता। वास्तविक सवाल यह है कि इन समझौतों से भारत के नागरिकों और उद्योगों को कितना लाभ मिला।
- व्यक्तिगत कूटनीति की भूमिका
प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति का एक दिलचस्प पहलू उनकी व्यक्तिगत कूटनीति भी है। दुनिया के नेताओं के साथ व्यक्तिगत संबंध बनाने और सार्वजनिक रूप से दोस्ताना माहौल दिखाने की उनकी शैली भारतीय विदेश नीति की पहचान बन चुकी है। इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी के साथ ‘मेलोडी’ टॉफी वाला प्रसंग सोशल मीडिया पर काफी चर्चित हुआ। इसी तरह अलग-अलग वैश्विक नेताओं के साथ मोदी की तस्वीरें और व्यक्तिगत केमिस्ट्री अक्सर भारतीय राजनीति और मीडिया में चर्चा का विषय बनती हैं। इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि व्यक्तिगत संबंध कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में संवाद का रास्ता खोल सकते हैं। लेकिन इसकी सीमा भी है। अंतरराष्ट्रीय संबंध अंततः राष्ट्रीय हितों, संस्थानों और दीर्घकालिक रणनीतिक गणनाओं पर आधारित होते हैं। व्यक्तिगत दोस्ती हमेशा व्यापारिक विवाद या रणनीतिक मतभेदों को समाप्त नहीं कर सकती। अमेरिका के साथ भारत का अनुभव इसका उदाहरण है। नेताओं के बीच व्यक्तिगत संबंध मजबूत होने के बावजूद नीतिगत मतभेद पैदा हो सकते हैं।
भारत की वर्तमान विदेश नीति को सबसे अच्छी तरह ‘विविधीकरण के माध्यम से रणनीतिक स्वायत्तता’ के रूप में समझा जा सकता है। भारत न तो अमेरिका से पूरी तरह दूर जा सकता है और न ही रूस को छोड़ सकता है। वह यूरोप को नजरअंदाज नहीं कर सकता और चीन की चुनौती के सामने जापान तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ सहयोग भी जरूरी है। इसलिए मोदी सरकार का रास्ता एक ही शक्ति-केंद्र पर निर्भर रहने के बजाय कई साझेदारों के साथ समानांतर संबंध बनाना है। यह रणनीति मौजूदा वैश्विक अस्थिरता में व्यावहारिक दिखाई देती है। लेकिन इसकी सफलता विदेश यात्राओं की संख्या या समझौतों की सुर्खियों से तय नहीं होगी।
यह सफलता तब मानी जाएगी जब इन साझेदारियों से भारत में नौकरियां पैदा हों, तकनीक आए, मैन्युफैक्चरिंग बढ़े, निर्यात बढ़े, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो और भारतीय कंपनियां वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनें। भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपनी कूटनीतिक सक्रियता को आर्थिक परिणामों में बदल सके।
यदि भारत यह करने में सफल रहता है तो वैश्विक अस्थिरता उसके लिए केवल खतरा नहीं बल्कि अवसर भी बन सकती है। दुनिया जब नए साझेदार खोज रही है, तब भारत के पास अपनी विशाल अर्थव्यवस्था, बाजार, युवा आबादी और बढ़ती तकनीकी क्षमता के बल पर खुद को एक आवश्यक वैश्विक साझेदार के रूप में स्थापित करने का मौका है। लेकिन इसके लिए विदेश नीति के साथ-साथ घरेलू अर्थव्यवस्था को भी उतना ही मजबूत करना होगा। आखिरकार, मजबूत विदेश नीति की असली ताकत मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था होती है।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

-अमरेश द्विवेदी-
अमेरिका भारत का सबसे बड़ा एकल निर्यात बाजार रहा है। ऐसे में अमेरिकी बाजार में किसी भी बड़े व्यापारिक व्यवधान का भारतीय उद्योग, निर्यातकों और रोजगार पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए यूरोप, ब्रिटेन, एशिया और अन्य क्षेत्रों में नए बाजार तलाशना भारत के लिए केवल कूटनीतिक विकल्प नहीं बल्कि आर्थिक आवश्यकता भी बन गया है।








जौनपुर। आदर्श मानस सेवा संस्था की ओर से रेहारी स्थित प्राथमिक विद्यालय में बच्चों को निशुल्क शिक्षण सामग्री और बिस्किट वितरित किए गए। कार्यक्रम में विद्यालय के कुल 60 बच्चों को कापी, पेन, पेंसिल, कटर और बिस्किट दिए गए। कक्षा एक से पांच तक अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने वाले मेधावी बच्चों को कापी-पेन देकर सम्मानित भी किया गया। संस्था के अध्यक्ष संतोष सिंह बंटी और संयोजक अरुण चौबे ने विद्यालय के शिक्षक-शिक्षिकाओं, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, रसोइया और उपस्थित अतिथियों को फूलमाला तथा अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया। शिक्षकों ने संस्था की इस पहल की सराहना करते हुए आभार जताया। प्राथमिक विद्यालयों में बेहतर शिक्षा का दावा संस्था के प्रबंधक मुकेश कुमार सिंह ने अभिभावकों से अपील की कि वे अपने बच्चों को प्राथमिक विद्यालयों में भेजें। उन्होंने कहा कि प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलती है। अभिभावक जिस तरह निजी नर्सरी विद्यालयों में बच्चों की पढ़ाई, पोशाक, बस्ता और गृहकार्य पर ध्यान देते हैं, उसी तरह प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों पर भी ध्यान दें तो यहां के बच्चे भी आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों की शिक्षा के साथ अभिभावकों का सहयोग और प्रोत्साहन उनके भविष्य को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कार्यक्रम में शिक्षण सामग्री और बिस्किट वितरण में प्रमोद ठाकुर, आदेश सिंह और विपुल प्रभा सिंह का सहयोग रहा। इस अवसर पर मुन्ना सिंह, अमित चौबे, मनोज सिंह, मनीष मिश्रा, लव चौबे, प्रधानाध्यापक राघवेंद्र सिंह, सहायक अध्यापक हिमांशु त्रिपाठी, प्रमिला देवी, अर्चना देवी, दुर्गावती, आशा सिंह सहित विद्यालय के बच्चे, ग्रामवासी और गणमान्य लोग मौजूद रहे।
मुहम्मदाबाद गोहना पुलिस की साइबर टीम ने CEIR पोर्टल के जरिए गुम/खोए हुए 13 स्मार्ट मोबाइल फोन बरामद कर उनके वास्तविक स्वामियों को सौंप दिए। बरामद मोबाइलों की कुल अनुमानित कीमत करीब ₹3.08 लाख है।
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